शक्ति तत्त्व
आदिनारायण पीठ के दर्शन में शक्ति तत्त्व को चेतना की सक्रिय अभिव्यक्ति के रूप में समझा जाता है।
शिव को यदि परम चेतना और शांति की दिशा माना जाए, तो शक्ति उस चेतना की गतिशीलता, सृजनशीलता और अभिव्यक्ति का आयाम है। शक्ति केवल बाहरी सामर्थ्य नहीं है। मनुष्य की इच्छा, बुद्धि, कर्मशक्ति, सृजनशीलता, साहस, धैर्य और परिवर्तन की क्षमता भी शक्ति के विभिन्न रूपों के रूप में समझी जा सकती है। लेकिन शक्ति का होना और शक्ति का सही उपयोग करना दो अलग बातें हैं। असंयमित शक्ति अहंकार, नियंत्रण, हिंसा और विनाश का कारण बन सकती है। धर्म से जुड़ी शक्ति संरक्षण, सृजन, सेवा और लोकमंगल का माध्यम बन सकती है।
इसलिए आदिनारायण पीठ की दृष्टि में:
शक्ति के साथ विवेक,
शक्ति के साथ संयम,
शक्ति के साथ उत्तरदायित्व आवश्यक है।
साधक को अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमताओं को पहचानना चाहिए, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत श्रेष्ठता का आधार नहीं बनाना चाहिए। शक्ति का सर्वोच्च उपयोग केवल स्वयं को शक्तिशाली बनाना नहीं, बल्कि अपनी क्षमता को धर्म और कल्याण की दिशा में लगाना है।शक्ति तत्त्व साधक को यह भी समझाता है कि जीवन में परिवर्तन केवल इच्छा से नहीं आता। उसके लिए संकल्प, अनुशासन, साधना और कर्म आवश्यक हैं।
नारायण तत्त्व शक्ति को धारण और लोकमंगल की दिशा देता है। शिव तत्त्व शक्ति को अहंकार और आसक्ति से मुक्त करने की दिशा देता है। इस प्रकार शक्ति तत्त्व दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बनता है।
शक्ति का जागरण तभी पूर्ण माना जा सकता है जब शक्ति साधक को अहंकारी बनाने के बजाय अधिक जिम्मेदार, संयमी और कल्याणकारी बनाए।