माया का विज्ञान
आदिनारायण पीठ में माया को केवल “यह संसार मिथ्या है” जैसे सरल कथन तक सीमित नहीं किया जाता।
माया को समझने का अर्थ है यह समझना कि मनुष्य किस प्रकार परिवर्तनशील वस्तुओं, विचारों, संबंधों, इच्छाओं और अपनी सीमित पहचान को अंतिम सत्य मानकर उनसे बंध जाता है। संसार अपने अनुभवों, संबंधों और कर्मों के साथ जीवन का वास्तविक क्षेत्र है। समस्या संसार का अस्तित्व नहीं, बल्कि उसके प्रति हमारी अज्ञानजनित आसक्ति और गलत पहचान हो सकती है।
मनुष्य कहता है - 
“यह मेरा है।”
“मैं ऐसा ही हूँ।”
“इसके बिना मैं अधूरा हूँ।”
“मेरी प्रतिष्ठा ही मेरी पहचान है।”
“मेरी इच्छा पूरी होना ही सुख है।”
ऐसी अनेक धारणाएँ धीरे-धीरे उसके भीतर बंधन पैदा करती हैं।
माया का विज्ञान साधक को इन धारणाओं को देखने की क्षमता देता है। माया को समझने के लिए केवल दार्शनिक अध्ययन पर्याप्त नहीं। साधक को अपने विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ, भय और प्रतिक्रियाएँ स्वयं देखनी होती हैं। यहीं से आत्मनिरीक्षण प्रारंभ होता है। माया का उद्देश्य संसार को नकारना नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति को समझना है। साधक धीरे-धीरे समझता है कि संसार परिवर्तनशील है, शरीर परिवर्तनशील है, परिस्थितियाँ परिवर्तनशील हैं और मन की अवस्थाएँ भी परिवर्तनशील हैं। इस समझ से वैराग्य उत्पन्न हो सकता है।
माया को समझने की यात्रा आगे अष्टपाश की पहचान की ओर ले जाती है। 
माया वह पर्दा है जिसे हटाने के लिए संसार छोड़ना आवश्यक नहीं; पहले यह देखना आवश्यक है कि पर्दा हमारे भीतर कहाँ बना हुआ है।