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मोक्ष की यात्रा इन बंधनों को पहचानने से शुरू होती है। इसलिए मोक्ष केवल अंतिम लक्ष्य की चर्चा नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन में भी साधना का विषय है।
साधक अपने व्यवहार में देखता है:
मैं किससे बंधा हूँ?
मुझे किस चीज का भय है?
किस वस्तु या व्यक्ति के बिना मैं स्वयं को अधूरा मानता हूँ?
मेरी पहचान किन चीजों पर टिकी हुई है?
मेरी इच्छाएँ मुझे चला रही हैं या मैं उन्हें समझकर चला रहा हूँ?
ऐसे प्रश्न साधक को आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाते हैं।
मोक्ष के मार्ग में ज्ञान, गुरु-मार्गदर्शन, ध्यान, मंत्र, नाद, योग, वैराग्य, आत्मनिरीक्षण और साधना के विभिन्न अंग सहायक हो सकते हैं। मोक्ष को केवल बौद्धिक समझ लेने से वह उपलब्ध नहीं हो जाता। जीवन में उस समझ का रूपांतरण आवश्यक है।
मोक्ष का अर्थ जीवन से भागना नहीं; उस अज्ञान और बंधन से मुक्त होना है जो जीवन को बंधन बना देता है।