अघोर दर्शन
अघोर आदिनारायण पीठ के दर्शन में एक गहन आंतरिक अवस्था और दृष्टि के रूप में समझा जाता है।
अघोर का अर्थ भयावह बाहरी रूप या विचित्र आचरण नहीं है।
आंतरिक अर्थ में अघोर उस चेतना की ओर संकेत करता है जिसमें भय, घृणा, अत्यधिक द्वैत और मानसिक संकुचन की पकड़ कम होती जाती है।मनुष्य सामान्यतः जीवन को पसंद और नापसंद, अपना और पराया, सुख और दुख, सम्मान और अपमान जैसी द्वैतात्मक धारणाओं में अनुभव करता है। अघोर साधना का उद्देश्य इन अनुभवों को नकारना नहीं, बल्कि उनके पीछे काम करने वाली मानसिक प्रतिक्रियाओं को समझना है।
अघोर का अर्थ अधर्म को स्वीकार करना नहीं है।अघोर का अर्थ यह भी नहीं कि साधक मर्यादा, स्वच्छता, नैतिकता या सामाजिक जिम्मेदारी छोड़ दे। इसके विपरीत, वास्तविक अघोर चेतना साधक में अधिक गहरी निर्भयता, करुणा, विवेक और समत्व उत्पन्न कर सकती है।
अघोर साधक अपने भीतर के भय को देखता है।
वह अपनी घृणा को देखता है।
वह अपने अहंकार को देखता है।
वह अपनी मृत्यु के भय को देखता है।
और धीरे-धीरे इन अनुभवों से अपनी अंतिम पहचान को अलग करने की दिशा में बढ़ता है। इसी कारण अघोर को शिव तत्त्व की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। अघोर का सार भयावह बनना नहीं, भय और द्वेष से परे होना है।