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पीठ के दर्शन में मुख्यतः निम्न तत्त्वों को एक क्रम में समझा जाता है:
नारायण → माया → अष्टपाश → शिव → अघोर → मोक्ष
नारायण
धारण, संतुलन, धर्म, करुणा, शक्ति और लोकमंगल की चेतना।
माया
परिवर्तनशील को स्थायी और सीमित पहचान को अंतिम सत्य मान लेने की स्थिति।
अष्टपाश
वे आंतरिक बंधन जो साधक को स्वतंत्र चेतना से दूर रखते हैं।
शिव
निर्लिप्तता, साक्षीभाव, वैराग्य, स्वतंत्रता और परम चेतना की दिशा।
अघोर
भय, घृणा और द्वैत की सीमाओं से ऊपर उठने वाली चेतना।
मोक्ष
बंधन से परम स्वतंत्रता की दिशा।
यह दर्शन संसार को छोड़ने की अनिवार्यता नहीं बताता। पहले साधक को जीवन में धर्मपूर्वक जीना सीखना है और फिर जीवन के प्रति अपनी आसक्ति को समझते हुए उससे आंतरिक स्वतंत्रता प्राप्त करनी है।
नारायण तत्त्व जीवन को धारण करना सिखाता है; शिव तत्त्व जीवन के बंधनों से मुक्त होना।