पीठ की स्थापना
आदिनारायण पीठ की स्थापना एक ऐसे आध्यात्मिक मार्ग को व्यवस्थित रूप देने के संकल्प से की गई है जिसमें दर्शन, साधना, गुरु-शिष्य परंपरा, अनुशासन, सेवा और लोकमंगल एक साथ जुड़े हों। आध्यात्मिक ज्ञान भारत की महान परंपरा में सदैव गुरु, साधना और अनुभव के माध्यम से आगे बढ़ता रहा है। समय के साथ अनेक ज्ञान-परंपराएँ विकसित हुईं, जिनका उद्देश्य मनुष्य को बाहरी जीवन से आंतरिक चेतना की ओर ले जाना रहा।
आदिनारायण पीठ इसी व्यापक सनातन आध्यात्मिक दृष्टि में अपने विशिष्ट साधना-पथ को व्यवस्थित करने का प्रयास है। पीठ की स्थापना का आधार किसी अन्य परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि एक स्पष्ट और व्यवस्थित साधना-दृष्टि का निर्माण है।
इस परंपरा में नारायण तत्त्व को जीवन, संतुलन, धर्म, करुणा और लोकमंगल की चेतना के रूप में तथा शिव तत्त्व को वैराग्य, स्वतंत्रता, अघोर और मोक्ष की दिशा के रूप में समझा जाता है। पीठ की स्थापना का उद्देश्य केवल एक संस्था का निर्माण नहीं, बल्कि ऐसी परंपरा का निर्माण है जिसे आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें, साध सकें और आगे बढ़ा सकें। इसके लिए दर्शन को ग्रंथों में, साधना को व्यवस्थित पद्धतियों में, शिक्षा को गुरु-शिष्य परंपरा में और सेवा को संस्थागत कार्यों में विकसित किया जाना आवश्यक है।
पीठ की स्थापना एक भवन की स्थापना नहीं, एक जीवित आध्यात्मिक परंपरा की नींव रखने का संकल्प है।