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लेकिन केवल इस विचार को मान लेना नारायण तत्त्व का जागरण नहीं है। जब व्यक्ति अपने जीवन में सत्य, संयम, करुणा, विवेक, उत्तरदायित्व और सेवा को विकसित करता है, तब यह तत्त्व व्यवहार में प्रकट होने लगता है।
नारायण तत्त्व व्यक्ति को संसार से पलायन नहीं सिखाता। यह उसे संसार में रहते हुए संतुलित और जागरूक जीवन जीने की शिक्षा देता है। परिवार, कार्य, समाज, धन, संबंध और जिम्मेदारियाँ साधक के लिए केवल सांसारिक विषय नहीं रहते; वे आत्मनिरीक्षण और साधना के क्षेत्र बन सकते हैं। नारायण तत्त्व की साधना में व्यक्ति धीरे-धीरे यह समझता है कि—
शक्ति के साथ उत्तरदायित्व आवश्यक है।
ज्ञान के साथ विनम्रता आवश्यक है।
प्रेम के साथ विवेक आवश्यक है।
धन के साथ धर्म आवश्यक है।
सेवा के साथ अहंकार-रहित भाव आवश्यक है।
स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी आवश्यक है।
नारायण तत्त्व का जागरण व्यक्ति को केवल स्वयं के सुख तक सीमित नहीं रखता। वह अपने अस्तित्व को परिवार, समाज, प्रकृति और व्यापक जीवन से जुड़े हुए रूप में देखने लगता है। इसी कारण नारायण तत्त्व को लोकमंगल की चेतना से भी जोड़ा जाता है। परंतु यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। संसार को धारण करते हुए साधक यह भी देखता है कि कहीं वह उसी संसार से बंध तो नहीं गया। यहीं से माया, अष्टपाश और आगे चलकर शिव तत्त्व की यात्रा प्रारंभ होती है।
नारायण तत्त्व जीवन को धर्मपूर्वक धारण करना सिखाता है; शिव तत्त्व उसी जीवन के बंधनों से मुक्त होना।