गुरु परंपरा
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। गुरु केवल जानकारी देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि साधक को उसकी साधना की दिशा समझाने वाला मार्गदर्शक होता है।
आदिनारायण पीठ में गुरु-परंपरा को ज्ञान, साधना, अनुभव और मर्यादा के जीवित हस्तांतरण के रूप में समझा जाता है।
गुरु साधक को मार्ग दिखाता है, साधना की त्रुटियों को पहचानने में सहायता करता है और आवश्यकता के अनुसार उचित दिशा प्रदान करता है।
 
दीक्षा के माध्यम से गुरु और साधक के बीच एक अधिक गंभीर आध्यात्मिक संबंध स्थापित होता है। गुरु-मंत्र, साधना-पद्धति और परंपरा की मर्यादाएँ इसी संबंध को व्यवस्थित आधार देती हैं। लेकिन गुरु-भक्ति का अर्थ विवेक का त्याग नहीं है।
 
आदिनारायण पीठ की दृष्टि में:
गुरु पूजनीय है, लेकिन सत्य और धर्म सर्वोपरि हैं। साधक प्रश्न कर सकता है, समझ सकता है और उचित विवेक के साथ अपनी साधना को आगे बढ़ा सकता है। गुरु की वास्तविक सफलता केवल अनुयायियों की संख्या में नहीं, बल्कि साधकों के जीवन में होने वाले आंतरिक परिवर्तन में दिखाई देती है।
गुरु परंपरा का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत सत्ता को अनंत बनाना नहीं, बल्कि ज्ञान और साधना की धारा को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखना है।
व्यक्ति परंपरा का धारक हो सकता है; परंपरा किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती।