कर्म और संस्कार
कर्म केवल बाहरी कार्य का नाम नहीं है। व्यक्ति के विचार, भावनाएँ, निर्णय, शब्द और कार्य उसके जीवन पर प्रभाव डालते हैं। बार-बार किए गए कर्म और प्रतिक्रियाएँ मन में गहरी प्रवृत्तियाँ बना सकती हैं। इन्हीं प्रवृत्तियों को संस्कार की दृष्टि से समझा जा सकता है। एक विचार बार-बार आने पर आदत बन सकता है। आदत बार-बार दोहराए जाने पर व्यक्तित्व का हिस्सा बन सकती है। इसी प्रकार व्यक्ति अपने व्यवहार के माध्यम से स्वयं को निरंतर गढ़ता रहता है।
आदिनारायण पीठ में कर्म और संस्कार को साधना से अलग नहीं माना जाता। यदि कोई व्यक्ति ध्यान करता है लेकिन अपने व्यवहार में लगातार असत्य, हिंसा, छल, लोभ और अहंकार को पोषित करता है, तो उसे अपने कर्म और संस्कारों का पुनः निरीक्षण करना चाहिए। साधना का एक उद्देश्य यही है कि व्यक्ति अपने भीतर की स्वचालित प्रतिक्रियाओं को पहचान सके।
कर्म के तीन महत्वपूर्ण स्तरों पर विचार किया जा सकता है:
विचार → वाणी → व्यवहार
इन तीनों में जागरूकता बढ़ाना कर्म-साधना का आधार बन सकता है। 
संस्कार अपरिवर्तनीय भाग्य नहीं हैं। साधना, विवेक, नए कर्म और निरंतर आत्मनिरीक्षण के माध्यम से व्यक्ति अपनी प्रतिक्रियाओं और जीवन-दृष्टि में परिवर्तन ला सकता है। कर्म से भागना समाधान नहीं है। कर्म को समझना, उसके परिणामों की जिम्मेदारी लेना और धर्मसम्मत कर्म करना साधना का हिस्सा है। जैसे कर्म जीवन को आकार देते हैं, वैसे ही सजग कर्म संस्कारों की दिशा बदल सकते हैं।